मौज दरिया की मेरे हक़ में नहीं तो क्या हुआ
कश्तियाँ भी पाँव उल्टे चल पड़ी तो क्या हुआ
आसमाँ गिरने में लगता है कि थोड़ी देर है
पाँवों के नीचे से खिसकी है ज़मीं तो क्या हुआ
राजधानी को तुम्हारी फ़िक्र है, यह मान लो
राहतें तुम तक अगर पहुँची नहीं तो क्या हुआ
देखिए उस पेड़ को तनकर खड़ा है आज भी
आँधियों का काम चलना है, चलीं तो क्या हुआ
कम से कम तुम तो करो ख़ुद पर यक़ीं, ऐ दोस्तो!
गर ज़माने को नहीं तुम पर यक़ीं तो क्या हुआ
कश्तियाँ भी पाँव उल्टे चल पड़ी तो क्या हुआ
आसमाँ गिरने में लगता है कि थोड़ी देर है
पाँवों के नीचे से खिसकी है ज़मीं तो क्या हुआ
राजधानी को तुम्हारी फ़िक्र है, यह मान लो
राहतें तुम तक अगर पहुँची नहीं तो क्या हुआ
देखिए उस पेड़ को तनकर खड़ा है आज भी
आँधियों का काम चलना है, चलीं तो क्या हुआ
कम से कम तुम तो करो ख़ुद पर यक़ीं, ऐ दोस्तो!
गर ज़माने को नहीं तुम पर यक़ीं तो क्या हुआ
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